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बादशाह का प्यार और सुनार – कहानी


एक बार एक बादशाह को एक लड़की पसंद आ
गयी। उस लड़की का बाप सुनार था, बादशाह
ने सुनार को दरबार में आने के लिए बुलावा भेजा।
चार दिन गुजरने के बाद भी सुनार बादशाह के दरबार में
नहीं आया तो बादशाह ने सुनार को गिरफ्तार करने के
लिए अपने सिपाही भेज दिए।
जब सिपाही सुनार के घर पहुंचे तो घर
को ताला लगा हुआ था। बादशाह ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि सुनार
को ढूँढो।
सिपाहियों ने सुनार को हर जगह ढूँढा, लेकिन
वो उनको कहीं नहीं मिला, फिर उन्होंने
एक तरकीब निकाली और ऐलान
किया कि जो भी सुनार को ढूँढने में मदद करेगा उसे एक
किलो सोना दिया जाएगा, फिर भी सुनार
नहीं मिला।
फिर ऐलान किया गया कि जो भी सुनार को छुपने में मदद
करेगा उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा, फिर
भी सुनार नहीं मिला, और सिपाहियों का सुनार
को ढूँढने में सारा वक़्त ऐसे ही बर्बाद हुआ जैसे आप
का इस को पढने में हुआ…. जिस का कोई मतलब
नहीं है।
हँसना मत, गुस्सा भी मत करना मेरे साथ
भी ऐसे ही हुआ था। आप
भी किसी और के साथ ऐसा करके बदला ले
सकते हैं।

Source :: Amar Ujala
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21 स्वर्ण मुद्राएँ कहानी – निलेश्वर चन्द्र जी [21 Sawarn Mudraen Kahani By Nileshwar Chandra Ji]


२१ स्वर्णमुद्राएँ
यह कहानी डॉ ईश्वर चंद्र जी की लिखी हुई है व निलेश्वर चंद्र जी मुझे ई
– मेल द्वारा भेजी है | कहानी बहुत
अच्छी है |

[यह एक काल्पनिक कहानी है, अगर पात्रों का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से सम्बन्ध बनता हो या घटनाओं में साम्य हो तो उसे महज संयोग समझा जाना चाहिए। ]

गालवपुर का पद्मेश्वरी विद्यालय, मध्य प्रांत में बहुत प्रसिद्ध है, उसके कई एक कारण हैं परन्तु सबसे प्रमुख कारण है, उसके प्रांगण की शोभा बढ़ाने वाली माता सरस्वती, गौतम बुद्ध और हाथी की विशाल व अप्रतिम सुन्दर प्रतिमाएं ! सरस्वती सभागृह को भी इतनी सुंदरता से सजाया गया है की बस ! उसकी छत पर कमल बनाए गए हैं।
मैं अपनी बड़ी बहन विभूति के साथ पहली बार जब उसके विद्यालय गया , तब  हांलाकि मेरी उम्र महज ९ या १० वर्ष की रही होगी लेकिन यह सब देख कर दंग रह गया और बरबस ही उस ‘तपस्वी’ के दर्शन की इच्छा हो गयी जिन्होंने यह सब बनाया था। सौभाग्य से मेरी बड़ी बहन उन्ही की शिष्या थी सो हम चित्र कला के परिसर में प्रविष्ट हो गए। एक छोटे से कमरे के एक कोने में लकड़ी के फट्टे पर वह कृष काय साँवले व्यक्तित्व के धनी ‘महान तपस्वी’ सो रहे थे। दोपहर का समय था जैसे ही हम दोनों की आहट उन्हें हुई ,वे सहज भाव से उठे और अपनी प्रेममय दृष्टी से हमे निहारते रहे. फिर हंसकर बोले -“बीऽऽभा”, वे मेरी बहन को इसी नाम से पुकारते थे। मैंने जाते ही उनके चरणों में अपना माथा रख दिया और वे जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगे !उनके ठहाके की गूँज पूरे परिसर में सुनी जा सकती थी ,उनका ठहाका उनकी पहचान थी ! लोग उन्हें रुद्राजी और बच्चे रूद्र-अण्णा कहा करते थे। रूद्रअण्णा निर्मल मन के ब्रम्हचारी थे। वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मानित कलाकार थे परन्तु अहंकार से कोसों दूर ! कुछ ही दिनों बाद उन्हें “पद्मश्री ” से नवाज़ा गया तो हम लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा !
गालवपुर की महारानी विजयलक्ष्मी एक अत्यंत सुन्दर और विदूषी महिला थी, वह चित्रकला और मूर्तिकला की कद्रदान थीं, इसीलिए उन्होंने यह पद्मेश्वरी विद्यालय भी बनवाया था और अपने गुरु रूद्रअण्णा  को वे हीं आग्रहपूर्वक शांति-निकेतन से गालवपुर लेकर आईं थीं ।
हम दोनों भाई-बहन अक्सर ही अपने उस चित्रकला के गुरु के चरणों में बैठा करते थे और कई एक बार हमने महारानी विजयलक्ष्मी जी को भी उनके चरणों में बैठे देखा था। रूद्र अण्णा से मिलने कभी-कभी मेरे पिता रामचन्द्र राव हरकरे , केशव केकरे और वामन राव करंदीकर भी आया करते थे, जो रूद्र अण्णा  के मित्रों में शुमार थे। रूद्र अण्णा का एक और मित्र था जिसका नाम था – ‘हरि नारायण द्विवेदी ‘!
सम्भवतः २-३ वर्ष गुजर गए थे। …. उस दिन गुरु पूर्णिमा थी , हम दोनों भाई बहन पुष्प-गुच्छ लेकर चित्रकला परिसर में प्रविष्ट हुए ही थे कि रूद्र अण्णा के कमरे से हमने हरिनारायण द्विवेदी अंकल को बाहर आते हुए देखा। … उनके हाथ में लाल रंग की अतिसुन्दर चमकदार मखमली थैली थी जिस पर राजचिन्ह “ऊगतासूरज” बना हुआ था। अंदर जाकर देखा तो गुरुदेव गहन निद्रा में निमग्न थे सो हम चुपचाप लौट आये। 
दिन गुजरते गए। …… ठीक एक वर्ष बाद पुनः गुरुपूर्णिमा के दिन मै और बहन विभूति रूद्र अण्णा के पास गए उनके चरणों में फूल और नारियल रखकर बैठ गए , उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया और अपने मित्र वामन राव से बातें करने लगे ।
वे कह रहे थे -“वामन राव, मेरे दिल में एक टीस है , आज तुम्हें पहलीबार ही बता रहा हूँ ….इस बात को शायद १०-११ माह हो गए …. एक दिन अपना हरि नारायण आया और बोला रुद्रा मैंने नया मकान बनवाया है उसके पाँचों कमरों की साज सजावट तुम्हें ही करनी है। दीवारों और छतों पर सीमेंट से कलात्मक डिज़ाइन बनाने है। तुम चिंता मत करना मैं तुम्हे भरपूर मेहनताना भी दूंगा और सीमेंट आदि का खर्च भी दूँगा।  मैंने ​सहर्ष स्वीकार कर लिया। हरी नारायण का मकान क्या था एक आलिशान कोठी… मैं सोचने लगा इसका केवल एक छापा खाना है , इतना पैसा इसके पास कहाँ से आया?… खैर, बड़ी मेहनत और लगन से मैंने फूल-पत्तियाँ , वीणा आदि के डिज़ाइन बनाये … ऊपर उल्टा लटककर जब मैं कार्य करता था तो मुझे कभी कभी कमर दर्द भी होता था …… परन्तु मुझे दुःखद आश्चर्य तब हुआ जब कमरे पर कमरे मै सजाता चला गया परन्तु हरी नारायण ने मुझे एक पैसा भी नही दिया, यहां तक की सीमेंट और गारा भी मैं अपने पैसों से खरीदता रहा और कार्य करता रहा. लगभग ५ महीनों की मेहनत के बाद जब पाँचों कमरों के सारे डिज़ाइन पूर्ण हो गए तब मैंने हरी नारायण से कहा -भाई मेरे पैसे न दो कोई बात नहीं , सीमेंट के और इस गरीब मजदूर के तो दे दो, तब वह बोला अच्छा एक माह बाद दे दूंगा. जब एक माह बाद मैं उसकी कोठी पर गया और पैसे की बात की तो हरिनारायण एकदम नाराज़ हो गया -बोला- तुमने ऐसा काम ही क्या किया है – मेरी कोठी को और खराब कर दिया – वैसे भी बहुत सा कार्य तो मैंने शर्मा से करवाया है और तुम्हारा मजदूर तो आता भी नहीं था , रोज़ तो मैं ही तगारी भर भर के देता था.…… मैं उसे देखता ही रह गया ….मेरे पास बोलने के लिए अब कुछ भी न था  …. मैं एक विद्यालय का शिक्षक, मेरे
​सारे रूपये खर्च हो चुके थे और अभी भी कुछ रुपया सीमेंट का , कुछ रुपया मजदूर का देना शेष था  … वहां से मैं सीधा अपने मित्र रामचँद्र राव  के घर गया , मेरे स्वभाव के विपरीत उनसे कुछ रूपये उधार लिए , आंसुओं को अपनी आँखों में थामे मैं सीमेंट की दुकान पर  फिर मजदूर के घर गया  उनके रूपये चुकता किये … अब उधारी पटा रहा हूँ …    “
तब वामन राव बोले “रुद्रा ! तुम भी ना एकदम भोलेभाले  हो , हरिनारायण द्विवेदी का काम करने से पहले मुझ से  पूछ तो लिया होता , तुम्हें मालूम है रामचन्द्र राव ने एक विधि-शास्त्र की और केकरे ने एक संगीत शास्त्र की पुस्तक लिखी थी , हरिनारायण को छापने को दी थी , हरी ने लेखक की जगह अपना नाम छाप लिया और ​राष्ट्रपति ​पदक भी प्राप्त कर लिया , लाखों रूपये भी कमा लिए !”
 
​तभी अचानक हम सभी का ध्यान दरवाजे की तरफ गया, महारानी विजयलक्ष्मी जी अंदर प्रवेश कर रहीं थीं , वह नीली साड़ी  में अत्यंत सुन्दर दिख रही थी  …  उनके हाथ में एक लाल रंग की सुन्दर मखमली थैली थी  जिस पर उनका राजचिन्ह ‘ऊगता-सूरज ‘ अंकित था  … हमारे अभिवादन को मुस्कुरा कर स्वीकार करते हुए वो आदत के अनुसार रूद्र अण्णा के चरणों में बैठ गई   …  अपनी थैली से उन्होंने एक चांदी की माँ सरस्वती की सुन्दर प्रतिमा निकाली और अपने गुरु को भेंट देते हुए विनम्रतापूर्वक बोली  -“गुरुदेव , मैं गुरुभक्तिवश आजतक आपको बता  ना सकी परन्तु आज पुनः गुरुपूर्णिमा है अतः बता रही हूँ  – विगत वर्ष इसी दिन मैं  यहां आई  थी  तब आप सो रहे थे , मैंने आपको उठाना उचित नहीं समझा , अतः  गुरुदक्षिणा की थैली आपके चरणों के समीप रखकर मैं चली गई थी  … आपने अपने स्वभावानुसार वह थैली खोलकर भी नहीं  देखी होगी  इसलिए बता रही हूँ  उसमें  हमारे राजपरिवार की २१ स्वर्णमुद्राएँ हैं  …  “

कहानी के लेखक :: डॉ ईश्वर चन्द्र जी
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Kahani – Vishwashghat by Nileshwar Chandra Ji (Hindi) PDF •• कहानी विश्वासघात


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Science G.K. in Hindi (Part – 2)


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1} निम्न में से किसमें ध्वनि की गति सबसे अधिक होती है?
A. हवा
B. जल
C. स्टील
D. उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर: स्टील

2} वर्षा की बूंदों का आकार गोल हो जाने का कारण है -
A. पृष्ठ तनाव
B. वायुदाब
C. गुरुत्व
D. श्यानता

उत्तर: पृष्ठ तनाव

3} ऊर्जा की इकाई है -
A. किलोवाट
B. किलोवाट घंटा
C. जूल/मीटर
D. जूल/सेकंड

उत्तर: किलोवाट घंटा

4} यदि कोई कुर्ता/कमीज सफेद है तो इसका अर्थ होता है -
A. वह प्रकाश को पूरी तरह से परावर्तित करता है
B. वह प्रकाश को पूरी तरह से अवशोषित कर लेता है
C.वह नीले रंग को अवशोषित कर लेता है
D. वह लाल रंग को अवशोषित कर लेता है

उत्तर: वह प्रकाश को पूरी तरह से परावर्तित करता है

5} निम्न में से कौन सा स्टेनलेस स्टील का घटक नहीं है?
A. टिन
B. कार्बन
C. क्रोमियम
D. निकिल

उत्तर: टिन
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